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छोटी छोटी कहानियां

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गर्मियों के दिन थे। एक प्यासा काऔ पानी की तालास में इधर उधर भटक रहा था। बहुत देर बाद इधर उधर भटकने पर उसे एक पानी का घड़ा मिला जिसमें थोड़ा पानी था। लेकिन पानी इतना नीचे था कि काऔ की चोंच पानी तक पहुंच नहीं सकती थी। काऔ ने हार नहीं मानी, उसने आस पास से छोटे छोटे पत्थरों को इकट्ठा किया और एक एक कर पानी के घड़े में डलने लगा। धीरे धीरे पानी उपर आने लगा। पानी उपर आने पर काऔ ने अपनी प्यास बुझाई। नेतिक शिक्षा,- मेहनत और शिक्षा से हर मुश्किल हल होती है। सच बोलने वाला चरवाहा की कहानी  एक गांव में चरवाहा लाडका था। जो भेड़ चाराता था एक मंजे के लिए भेड़िया आया भेड़िया आया चिल्लाता था। और गांव वाले आते तो खुव हंसता। एक दिन सच में भैडिआ आ गया। और लडके ने खुव चिलाआ। पर इस बार गांव वाले नहीं आये। और भेडिआ उसकी सारी भेड़ें ले गया। नेतिक शिक्षा - झुंड बोलने पर कोई भारोसा नहीं करता इसलिए सच बोलो।  लालची कुत्ता की कहानी  एक कुत्ता को हड्डी का टुकड़ा मीरा।वह खुशी खुशी घर जा रहा था। रास्ते में एक नदी आईं। नादी के पानी में उसे अपनी परक्षाई दिखाई दी उसे लगा क...

हल्दीघाटी का युद्ध

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हल्दीघाटी का युद्ध जुन  1576 मेवाड़ के महाराणा प्रताप का समर्थन करने वाले घुड़सवार व धनुर्धारी का समर्थन प्राप्त है। राणा की सेना और मुगलों के बीच युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह पृथम ने किया था। अकबर की सेना महाराणा प्रताप की सेना से चार गुनी बड़ी थी। इस युद्ध में पृताप को भीलों का सहयोग भी मिला था। इस युद्ध में मुगलों की सेना में मानसिंह सहित कई सेना पति थे। फिर भी महाराणा प्रताप के आगे टिक नहीं पाए।  चारण रामा जी साधु महाराणा प्रताप के सेना नायक के रूप में हल्दीघाटी में उपस्थित थे। उन्होंने बड़ी वीरता से युद्ध किया था और मुगलों को सबसे अधिक छतिगसत किया था।  1568 चितोडगड की विकट घेराबंदी ने मेवाड़ की उपजाऊ पूर्व बेल्ट मुगलों को दे दिया था। बल्कि बाकी जंगल और पहाड़ी राज्य पृताप के हाथ में थे। मेवाड़ के माध्यम से अकबर गुजरात के लिए स्थिर मार्ग हासिल करने का आमदा रखता था। लेकिन महाराणा प्रताप की वीरता के मारे आगे नहीं बढ़ पाया  1572  को पृताप सिंह को राजा का ताज पहनाया गया। तो अकबर ने की दुतो को भेजा, और अकबर ने लोगों को वहां का जागीरदार बानाने क...

The gift of the magi

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The article is about the sort story.for the gifts presented to Jesus, see gift of the Magi. For other users, see the gift of the magi ( disambiguation). "The gift of the magi' is a short story by American writer o.henry , first published in 1905. The story tells of a young husband and wife and how they deal with the challenge of buying secret Christmas gift of each  Other with only a small amount of money . As a sentimal story with a moral lesson about gift giving, it has been popular for presentation at Christmas time.the plot and it's twist ending are well known, the ending is generally considered an example of cosmic irony the story was allegedly written at pet's tavern on lirving place in New York City . The story was initially published in the New York Sunday world under  The title "gift of the magi' on desember 10,1905 It was first published in book form in the o.henry collection The four million in April 1906. The gift of the magi  One dollar amd eighty...

महाराणा प्रताप का जन्म स्थान

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महाराणा प्रताप के जन्म स्थान के प़ृस्न पर दो धारनाय आती है।पहला महाराणा प्रताप का जन्म कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। क्योंकि महाराणा उदय सिंह एवं जयवंताबाई का विवाह कुंभलगढ़ में हुआ । दूसरी धारणा यह है कि उनका जन्म पाली के राजमहलों में हुआ। महाराणा प्रताप की मां का नाम जयवंताबाई था। जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप का बचपन भील सामुदाय के साथ बीता, भीलों के साथ ही वे युद्ध कला सीखते थे , भील अपने पुत्र को कीका कहकर पुकारते हैं। इसलिए भील महाराणा प्रताप को कीका कहकर पुकारते थे। लेकिन लेखक बिजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार जब प़़ताप का जन्म हुआ था उस समय उदय सिंह युद्ध आसुरछा से घिरे हुए थे कुंभलगढ़ किसी तरह से सुरक्षित नहीं था। जोधपुर के शक्तिशाली राठोड़ी राजा, राजा मालदेव उन दिनों उत्तर भारत के साबसे शक्तिशाली थे। एवं जयवंताबाई के पिता एवं पत्नी के सासक सोनगरा अखैराज मालदेव का एक विश्वसनीय सामंत एवं सेनानायक था। इस कारण से पाली और मारवाड़ सुरक्षित था।  और रणबंका राठोड़ो की कामधज सेना के सामने अकबर की शक्ति कम थी। अतः जयवंताबाई को पाली भेजा ग...

खरगोश और कछुआ की दौड़

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खरगोश और कछुआ की दौड़  कछुआ और खरगोश ने दौड़ चालू की और देखते ही देखते खरगोश, कछुआ से बहुत आगे निकल गया और कछुआ बहुत पीछे रह गए, और खरगोश ने सोचा कि थोड़ी देर आराम कर लिया जाए। और वह वहीं एक पेड़ के नीचे बैठ गया। थोड़ी देर बाद वह वहीं लेट गया और आलस आने पर उसको नींद आ गई। वहीं कछुआ धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था, और थोड़ी देर बाद कछुआ खरगोश से बहुत आगे निकल गया। अब थोड़ी देर बाद खरगोश की नींद खुली और वह आगे निकला तो थोड़ी देर बाद वह दखता की कछुआ तो जीत की लाइन पार कर चुका है। और कछुआ यह रेस जीत गया। इस काहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें धीरे धीरे आगे बढ़ते रहना चाहिए।

गधा और धोबी। एक निर्धन धोबी था। उसके पास एक गधा था। गधा काफी कमजोर था क्योंकि उसे बहुत कम खाना पीना मिलता था। एक दिन, धोबी को मरा हुआ बाग़ मिला । उसने सोचा, मै गधे ऊपर बाग़ की खाल डाल दूंगा , ओर उसे पड़ोसियों के खेत में चरने के लिए छोड़ दिया करुंगा । किसान समझेंगे कि वह सच मुच का बाग़ है। और किसान उससे डरकार दूर रहेंगे। और वह आराम से खेत चर लिया करेगा। धोबी ने अपनी योजना पर अमल कर डाला। उसकी योजना काम कर गई। एक रात गधा रात में खेत में चर रहा था। की उसे अचानक गधे के रेंकने की आवाज सुनाई दी और वह भी जोश में रेंकने लगा । गधा की आवाज से किसानो को गधे की असलियत का पता चल गया। और उन्होंने गधे की खूब पिटाई की। और इसलिए कहा गया है कि हमें अपनी सच्चाई कभी भी नहीं छुपानी चाहिए।

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